नमस्कार दोस्तों मिड-डे मील योजना, जिसे अब PM POSHAN (Pradhan Mantri Poshan Shakti Nirman) योजना के नाम से जाना जाता है, सरकारी स्कूलों में करोड़ों बच्चों की पढ़ाई और पोषण की रीढ़ है। साल 2026 इस योजना के लिए कई बड़े बदलावों, बजटीय घोषणाओं और विवादों वाला साल रहा है। आइए, जानते हैं कि इस साल मिड-डे मील योजना के तहत क्या-क्या हुआ है और आगे क्या उम्मीद की जा सकती है।
2026 की बड़ी खबर योजना को मिला विस्तार और बड़ा बजट
साल 2026 की शुरुआत में मिड-डे मील योजना को लेकर एक बड़ी राहत की खबर आई। योजना की अवधि, जो 31 मार्च 2026 को समाप्त हो रही थी, को 30 सितंबर 2026 तक बढ़ा दिया गया । यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि 16वें वित्त आयोग (2026-27 से 2030-31) के लिए योजना की मंजूरी प्रक्रिया पूरी होने तक बच्चों को भोजन मिलता रहे ।
इसके अलावा, सरकार ने 2026-27 के लिए PM POSHAN योजना के लिए ₹12,750 करोड़ का बजट आवंटित किया, जो पिछले वर्षों के आवंटन से अधिक है । यह योजना देशभर के 10.35 लाख से अधिक स्कूलों में करीब 11 करोड़ बच्चों को गर्म, पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराती है । हालांकि, एक चिंता का विषय यह भी है कि 2025-26 में केंद्रीय शिक्षा योजनाओं का केवल 51% ही उपयोग हो पाया था, जिस पर संसदीय समिति ने चिंता जताई है ।
2026 का सबसे बड़ा विवाद अंडा या शाकाहार? पश्चिम बंगाल का मामला
2026 में मिड-डे मील योजना से जुड़ी सबसे गरमागरम बहस पश्चिम बंगाल से उठी। राज्य की नई सरकार ने कोलकाता नगर निगम के स्कूलों में मिड-डे मील बनाने की जिम्मेदारी इस्कॉन (ISKCON) की अन्नमित्रा फाउंडेशन को सौंप दी । चूंकि इस्कॉन शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसता है, इसलिए मेनू से अंडे को हटाकर पनीर और राजमा जैसे विकल्प शामिल किए गए ।
इस फैसले ने पोषण विशेषज्ञों और विपक्षी दलों में तीखी प्रतिक्रिया दी। आलोचकों का कहना है कि अंडा प्रोटीन का सबसे सस्ता और बेहतरीन स्रोत है, और कुपोषण से जूझ रहे बच्चों के लिए यह बहुत जरूरी है । वहीं, सरकार और इस्कॉन का तर्क है कि शाकाहारी भोजन में भी पोषण की कमी नहीं होने दी जाएगी । यह मुद्दा एक बार फिर से इस सवाल को उठाता है कि क्या धार्मिक मान्यताओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति पर हावी होने देना चाहिए ।
राज्यों में क्या हो रहा है?
जहां एक ओर पश्चिम बंगाल में विवाद है, वहीं अन्य राज्य योजना को बेहतर बनाने में जुटे हैं।
उत्तर प्रदेश: स्कूलों में पोषण पर विशेष फोकस
उत्तर प्रदेश सरकार ने स्कूलों की छुट्टियों के बाद बच्चों को बेहतर भोजन देने के लिए एक विस्तृत कार्य योजना बनाई है । इस योजना के तहत:
- स्वच्छता: रसोई से लेकर पानी की टंकियों तक, हर जगह सफाई सुनिश्चित की जाएगी ।
- सुरक्षा: हर स्कूल में अग्निशामक यंत्र (fire extinguisher) की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी और रसोइयों को इसके इस्तेमाल का प्रशिक्षण दिया जाएगा ।
- किचन गार्डन: स्कूलों में किचन गार्डन को बढ़ावा दिया जाएगा ताकि ताजी सब्जियों का इस्तेमाल हो सके ।
- सामुदायिक भागीदारी: ‘तिथि भोजन’ कार्यक्रम के जरिए समुदाय को भी इस पहल से जोड़ा जाएगा ।
पंजाब: 9% गिरावट पर चिंता और ₹352 करोड़ का बजट
पंजाब में सरकारी स्कूलों में नामांकन में 9% की गिरावट दर्ज की गई है, जिसे लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने चिंता जताई है । इसके बावजूद, पंजाब को 2026-27 के लिए ₹352.39 करोड़ का बजट मंजूर किया गया है, जिसमें केंद्र की हिस्सेदारी ₹220.49 करोड़ होगी ।
आंध्र प्रदेश: ‘स्मार्ट किचन’ और रोजगार की बहस
आंध्र प्रदेश सरकार मिड-डे मील के लिए ‘स्मार्ट किचन’ शुरू कर रही है, जिससे भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा बढ़ेगी । विपक्ष ने आरोप लगाया कि इससे रसोइयों की नौकरी जाएगी, लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया कि किसी भी मौजूदा कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकाला जाएगा और इससे 38 हेड कुक, 22 असिस्टेंट कुक, 256 हेल्पर और 76 ड्राइवरों के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे ।
चुनौतियां: LPG संकट और रसोइयों की मुश्किलें
मिड-डे मील योजना के सामने एक बड़ी चुनौती LPG सिलेंडर की किल्लत भी है। वैश्विक संकट के कारण LPG की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे कई स्कूलों को फिर से लकड़ी (firewood) पर खाना पकाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है ।
इसका सबसे ज्यादा बोझ महिला रसोइयों (cook-cum-helpers) पर पड़ रहा है। 24 लाख रसोइयों में से 90% से अधिक महिलाएं हैं, जिन्हें महज ₹1,000 प्रति माह का मानदेय मिलता है । लकड़ी पर खाना पकाने से उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है—आंखों में जलन, सांस की बीमारियाँ और पीठ दर्द आम समस्याएँ हैं । यह एक गंभीर मुद्दा है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता।
निष्कर्ष
Mid Day Meal Scheme 2026 कई मोर्चों पर सुर्खियों में रही। एक तरफ सरकार ने योजना के विस्तार और बजट बढ़ाने का काम किया, तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में अंडे को लेकर विवाद, LPG संकट और रसोइयों की बढ़ती मुश्किलें चिंता का विषय बनी रहीं। योजना की सफलता के लिए जरूरी है कि पोषण की गुणवत्ता से समझौता न किया जाए, रसोइयों की स्थिति सुधारी जाए और राजनीतिक-धार्मिक बहसों को बच्चों के स्वास्थ्य पर हावी न होने दिया जाए।











